शुक्रवार 6 नवंबर 2026 - 15:11
हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की ज़ात; ख़ैर, बरकत और रहमत ए इलाही का मरकज़ है

हौज़ा / इमाम ए जुमआ गौराबादशाहपुर, जौनपुर मौलाना सैयद अली अब्बास हायरी ने ख़ुत्बा-ए-जुमआ में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की पाकीज़ा सीरत को ख़ैर, बरकत और रहमत-ए-इलाही का अमर स्रोत बताते हुए कहा कि आपकी ज़िंदगी तक़वा, इबादत, ईसार और इंसानियत की सेवा का बेहतरीन व्यावहारिक नमूना है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैयद अली अब्बास हायरी ने 6 नवंबर 2026 को नमाजे जुमआ के खुत्बे मे फरमाया,अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ख़ुत्बा-ए-जुमा की प्रसिद्ध वसीयत
«أُوصِيكُمْ عِبَادَ اللَّهِ بِتَقْوَى اللَّهِ»
ऐ अल्लाह के बंदो! मैं तुम्हें तक़वा-ए-इलाही की वसीयत करता हूँ की रोशनी में बताया गया कि तक़वा केवल व्यक्तिगत इबादत का नाम नहीं है, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी को ख़ैर, बरकत और रहमत का स्रोत बनाने का नाम है।

क़ुरआन-ए-करीम ने नेक किरदार इंसानों की पहचान «فِعْلَ الْخَيْرَاتِ» यानी अच्छे और नेक काम करना बताया है। इस दृष्टि से हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की मुबारक ज़िंदगी तक़वा, ख़ैर और बंदगी का ऐसा व्यावहारिक नमूना है, जिसमें इबादत, ईसार मारिफ़त और इंसानियत की सेवा के सभी पहलू स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

ख़ैर से तात्पर्य हर उस नेकी और भलाई से है, जो इंसान को कमाल, कामयाबी और क़ुर्बे इलाही तक पहुँचाए, जबकि बरकत उस ख़ैर के निरंतर बने रहने, उसके विस्तार और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने का नाम है। क़ुरआन-ए-करीम ने सूरह कौसर में रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही वसल्लम को यह शुभ सूचना दी: «إِنَّا أَعْطَيْنَاكَ الْكَوْثَرَ» मक्तबे अहलेबैत अलैहिमुस्सलाम की व्याख्यात्मक रिवायतों में कौसर के उदाहरणों में हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा को विशेष स्थान प्राप्त है।

आपकी ज़ात से नस्ले रसूल का सिलसिला जारी रहना, सिलसिला-ए-इमामत का क़ायम होना और इल्म व हिदायत के नूर का फैलना इस सच्चाई का स्पष्ट उदाहरण है कि आपकी ज़ात ख़ैर और बरकत का एक स्थायी स्रोत है।

रहमत का अर्थ केवल शफ़क़त और मेहरबानी तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरों की ज़रूरत को महसूस करना, उनकी परेशानियों को दूर करना और उन्हें सौभाग्य के रास्ते पर आगे बढ़ाना भी रहमत है।

हज़रत फ़ातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा की ज़िंदगी में यह विशेषता बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। आपने अपनी ज़रूरत के बावजूद दूसरों को प्राथमिकता दी। इसकी बेहतरीन क़ुरआनी तस्वीर सूरह दहर की उन आयतों में मिलती है, जिनमें खाना खिलाने का उल्लेख है:

«وَيُطْعِمُونَ الطَّعَامَ عَلَىٰ حُبِّهِ مِسْكِينًا وَيَتِيمًا وَأَسِيرًا»

(और वे अल्लाह की मुहब्बत में मिस्कीन, यतीम और क़ैदी को खाना खिलाते हैं।)

आपकी सीरत हमें यह शिक्षा देती है कि वास्तविक रहमत वही है, जो इंसान को अपनी ज़ात से ऊपर उठाकर दूसरों के दर्द और उनकी ज़रूरतों का एहसास कराए।

ख़तीब-ए-जुमआ ने अंत में इस बात पर ज़ोर दिया कि आज समाज को ऐसे किरदार की ज़रूरत है, जो ख़ैर पैदा करे, बरकत को बढ़ावा दे और रहमत को आम करे। यदि हमारे घरों में सीरत-ए-हज़रत ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के अनुसार ईसार, समाज में सेवा और व्यक्तिगत जीवन में इबादत व तक़वा की झलक पैदा हो जाए, तो यही आपकी वास्तविक मारिफ़त और पैरवी होगी।

हमें केवल ख़ैर की तलाश करने वाला नहीं, बल्कि ख़ैर फैलाने वाला बनना चाहिए। केवल बरकत का तलबगार नहीं, बल्कि दूसरों के लिए बरकत का ज़रिया बनना चाहिए। इसी तरह केवल रहमत का उम्मीदवार नहीं, बल्कि अपने किरदार के माध्यम से रहमत-ए-इलाही का प्रतिबिंब बनने की कोशिश करनी चाहिए।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha